” मित्रता – उम्र भर की पूंजी “मनोज त्रिपाठी

पंचायत वेवसीरीज का डायलॉग हैं ” दोस्त यार कह देने से कोई दोस्त यार नहीं बन जाता। दोस्ती यारी निभाना भी पड़ता है ।,” सचिव के द्वारा कहा गया डायलॉग।
इस डायलॉग ने दिल को छू लिया। संभवतः ऐसे बेहतरीन डायलॉग और शानदार फिल्मांकन के कारण ये वेबसीरीज इतनी हिट रही। जिसमे जरा सा भी उत्तेजक दृश्य नही है। फिर भी हिट रही।
मेरे बहुत सारे मित्र इस डायलॉग की कसौटी पर खरे उतरते हैं। जिनकी
अहैतुकी मित्रता मेरे साथ रही है। कई अवसरों मेरे इन मित्रों ने इस डायलॉग को चरितार्थ किया है।
गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते है
जे न मित्र दुःख होहि दुखारी।
तिन्हहिं बिलोकत पातक भारी।।
जब मैं खुद को इस कसौटी पर परखने की कोशिश करता हूं तो मुझे लगता है कि मुझे मित्रों के प्रति और सचेत होना चाहिए। जब मैं बचपन से लेकर अब तक के मित्रों को याद करता हूं तो मुझे लगता है कि चाहे वो महिला मित्र रहे हो या पुरुष मित्र रहे हो , किसी के साथ मेरा कोई कटु अनुभव नहीं रहा हैं। मैं यकीनी तौर पर कहता हूं कि मेरे दोस्त ही मेरी उम्र भर की पूंजी हैं।
भारतीय आख्यानों में मित्रता को लेकर बहुत लिखा गया है। राम – सुग्रीव, कर्ण – दुर्योधन, अर्जुन – कृष्ण न जाने कितने उदाहरण हैं। भारतीय नीति कथाओं में तो मित्रता की कहानियां भरी पड़ी है। प्रेमचंद की कहानी दो बैलों की कथा मित्रता की शानदार कहानी हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मित्रता पर लिखा निबंध, मित्र को कई आयामों से देखता हैं।
यूं तो मेरे पास सच्चे मित्रो की कभी कोई कमी नहीं रही। किसी एक का नाम लेना ज्यादती होगी, चाहे वे पुरूष हो या महिला। लेकिन कक्षा 6 में हुई मित्रता का एक जिक्र करना चाहूंगा। नाम था धर्मेंद्र गुप्ता। हम लोग किशोरावस्था की ओर बढ़ रहे थे। तमाम बाते जो समाज के लिए प्रतिबंधित थी उसी से होती थी ।
मेरा स्कूल मेरे घर से लगभग 4 km दूर था। कभी पैदल कभी साइकिल से जाते थे। उसका घर कस्बे में ही था। अक्सर उसके घर मैं जाता था। उसके घर शटर वाली ब्लैक एंड व्हाइट टीवी थी। जब रामायण सीरियल शुरू हुआ तो वो मुझसे कहता रविवार को आकर रामायण देखो बहुत अच्छा आता है। मैं कहता अरे रामायण क्या देखना , हमलोग हर साल रामलीला खेलते है, हमारी रामलीला 1923 से चल रही हैं। हमसे अच्छा टीवी वाले क्या करेंगे। इस अहंकार में मैं बहुत दिनों तक गया नहीं। उसके बहुत कहने पर एकबार मैं गया। रामायण देखते ही मैं अभिभूत हो गया। क्या बेहतरीन अभिनय और सीरियल है लाजवाब। अपनी मूर्खता पर रोना आया।
जब मैंने पहली बार रामायण देखा था तो उस एपिसोड में भगवान राम समुद्र पर सेतु बना कर उसपर अपना पांव रख रहे थे। वह अप्रतिम सौंदर्य और दृश्य आज भी जस का तस जेहन में ताजा हैं। उतनी दूर हर संडे जाना संभव नहीं था। कुछ दिनों बाद मेरे गांव के बगल वाले गांव में टीवी आ गई, मैं वहां जाने लगा।
उसी के साथ थियेटर में जाकर मैंने पहली बार फिल्म देखी थी। फिल्म थी राम तेरी गंगा मैली। शायद क्लास 7 या 8 में था । मेरे कस्बे में ये फिल्म लगी थी। कस्बे में एक ही सिनेमा हॉल था।मैने पिता जी बताया कि मुझे अपने दोस्त के साथ फिल्म देखने जाना है। पैसा दे दीजिए। उन्होंने कहा कौन सी फिल्म, मैंने कहा राम तेरी गंगा मैली। फिर उन्होने कुछ नहीं पूछा, पैसे दे दिए।
हम लोग 12 से 3 का शो देखने गए। फिल्म की चर्चा हम लोग करते ही थे। रास्ते में तय हुआ की जब फिल्म में स्पेशल सीन आयेगा तो सर नीचे कर लेंगे हम लोग। फ़िल्म में जब वो खास सीन आए तो हम लोगो ने कुछ देखा और कुछ सर झुकाए भी। घर आने पर पिता जी ने पूछा कैसी लगी। हमने कहा ठीक थी। पता नही उन्हे उस फिल्म के बारे में कुछ पता था या नहीं।्
आज धर्मेन्द्र एक सफल डॉक्टर हैं, उसकी पत्नी भी डॉक्टर है। दोनो एक साथ बरेली के राममूर्ति मेडिकल कालेज में पोस्टेड है। गाहे बगाहे मुलाकात हो जाती है, यदा कदा फ़ोन।
मेरा एक शेर है……..
दोस्ती रास्ता है कोई मंजिल नहीं
जिसमें कोई मील का पत्थर नहीं।
# मनोज त्रिपाठी इफको फूलपुर, प्रयागराज#
