…..श्री कृष्ण जन्माष्टमी का शुभ पर्व/त्यौहार/व्रत मनाने का निर्णय भिन्न है – विभा मिश्रा
मुँगराबादशाहपुर, जौनपुर । श्री कृष्ण जन्माष्टमी का शुभ पर्व/त्यौहार/व्रत मनाने का निर्णय भिन्न है। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार योगीश्वर .
….श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि,
मासि भाद्रपदेऽष्टम्यां निशीथे कृष्णपक्षगे।
शशांके वृषराशिस्थे ऋक्षे रोहिणीसंज्ञके।।
योगेऽस्मिन् वसुदेवाद्धि देवकी मामजीजनत्।
तस्मान्मां पूजयेतत्र शुचिः सम्यगुपोषितः।।
…..अर्थात् भाद्रपद कृष्ण अष्टमी के दिन अर्धरात्रि में जब चन्द्र रोहिणी नक्षत्र

में था, तब मुझे माता देवकी ने जन्म दिया। अतः इसी तिथि काल के योग में विधिवत उपवास रख कर मेरी पूजा करनी चाहिए।
…..इसके अतिरिक्त विष्णुधर्मोत्तर पुराण, भविष्य पुराण, हरिवंश पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीमद्भागवत, वशिष्ठ संहिता आदि ग्रन्थों का भी यही मत है।
…..इस वर्ष 11 अगस्त मंगलवार को अष्टमी तिथि सुबह 09/08 से प्रारम्भ होकर 12 अगस्त बुधवार को सुबह 11/17 तक विद्यमान रहेगी। चूँकि वासुदेव का जन्म अर्धरात्रि में 12 बजे हुआ था, अतः स्मार्त मतानुसार गृहस्थजनों को श्री कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव 11 अगस्त मंगलवार को मनाना ही धर्मसम्मत है।
…..वैष्णव जन यह तो मानते हैं कि, श्रीकृष्ण का जन्म अर्धरात्रिव्यापिनी अष्टमी में हुआ था, और उस समय रोहिणी नक्षत्र था, लेकिन उनका मत है कि सप्तमीविद्धा अष्टमी में व्रत नहीं करना चाहिए। सप्तमीविद्धा अष्टमी को त्याग देने वाले वैष्णव सम्प्रदाय के संत श्रीकृष्ण जी के जन्म समय के महत्वपूर्ण काल अष्टमी तिथि की किंचित परवाह नहीं करते। जबकि सनातन व्रत पर्वादि के सिद्धान्तानुसार सर्वत्र कर्मकाल (वह समय जो उस व्रतादि का मुख्य समय होता है) को ही प्रधानता व मान्यता प्राप्त है।
….. ‘कर्मणो यस्य यः कालः तत्कालव्यापिनी तिथिः। अर्थात् व्रत पर्व के कर्मकाल के समय विद्यमान व्रत तिथि के दिन ही वह व्रत पर्व मनाना चाहिए।
….. अधिक लिखने से अति विस्तार का भय है, अतः संक्षिप्त में सभी गृहस्थ जन 11 अगस्त मंगलवार को ही श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाएं, यही उचित है।
…..श्री कृष्ण जयन्ती के लिए अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र का योग हो तब जयन्ती योग बनता है, इस वर्ष इस योग का अभाव है.
…..अब स्मार्त वैष्णव का भेद जान लीजिए, जिन लोगों के समस्त क्रियाकलाप स्मृतियों के आधार पर माने जाते हैं, वे स्मार्त कहलाते हैं। सामान्य तौर पर गृहस्थजन ही स्मार्त हैं। वैष्णव वे कहे जाते हैं जो रामानन्दी, निम्बार्क, भागवत, चक्रांकित महाभागवत आदि परम्परा में दीक्षा ले लेते हैं। जिस प्रकार वैष्णव परम्परा है, उसी प्रकार शैव, शाक्त आदि हैं। उदाहरण के लिए मैं स्वयं शाक्त परम्परा में गुरूदीक्षा लिए हूँ, अतः मैं शाक्त हुआ, किंतु सनातनधर्मी होने से स्मार्त हूँ। हम सब गृहस्थ तो स्मार्त ही हैं।
…..इसको ऐसे समझिए,
…..श्रुति= वेद.
….. स्मृति=सनातन संविधान.
….. पुराण= सनातन इतिहास।
…..सभी आत्मीय जनों को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं.
जगदाधार, वासुदेव, देवकीनंदन, नटवर नागर, बंशीधर, आनंदकन्द श्रीकृष्णचंद आप सब पर कृपा बनाए रखें, आपकी उचित मनोकामनाएं पूर्ण करें।
हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की।
यशुदा के लाल की, जय मदन गोपाल की।
