होली पर समाजिक समरसता और हुड़दंग पर विशेष-
आखिरकार रंगों उमंगों और खुशियों का त्यौहार होली आ ही गया।कल होलिका दहन और परसों होली मिलन होगा।।होली के हुडदंग की शुरुआत ब्रज की लठ्ठमार होली के रंग और हुड़दंग से हो चुकी है।कहते हैं कि साल में होली का एकमात्र ऐसा त्यौहार आता है जो सैकड़ों वर्ष पुरानी दुश्मनी को भुला देता और गले मिलकर गुलाल लगाते ही दुश्मन दोस्त बन जाता है।समाजिक समरसता के प्रतीक होली के त्यौहार पर मुंह जाति छोटा बड़ा गरीब अमीर देखकर नहीं बल्कि जो सामने हाथ फैलाकर आ जाता है उसे गले लगा लिया जाता है। होली मिलन ऐसा होता है कि दिल से दिल और गले से गला मिलते जाता है और पुरानी बातें गिले शिकवे सब भूल जाती हैं। होली का त्यौहार रंग और भंग के बिना सूना लगता है और जिन्हें रंग से एलर्जी होती है वह भी माथे पर रंग का तिलक जरूर लगाते हैं। होली की शुरुआत तो बसंत पंचमी से ही हो जाती है और मौसम रंगीन मदमस्त होने लगता है और खेतों में फसल लहलहाने लगती है। कहते हैं कि फाल्गुन महीने में होली के हुड़दंग में बाबा भी देवर लगने लगते हैं और जब फाग गाकर ढोल की ताल पर रंगों की बौछार करते हैं तो भौजाई बहू कुछ भी नहीं देखते हैं।एक समय था जबकि बसंत पंचमी के दिन होली गाड़ दी जाती थी और घर घर गाँव गली मोहल्लों में हंसी मजाक से भरे फाग गीत शुरू हो जाते थे और होली जलने के साथ ही होलिका दहन स्थल से ही रंगों और फागुवा गीतों कबीरों से हो जाता था। होलिका दहन के पहले पुरोहित आते थे और निश्चित समय पर मंत्रोच्चार के साथ होली जलवाते थे।लोग एक पखवाड़े तक अपने सारे कामकाज छोड़कर अपने नाते रिश्तेदारों गाँव जेवार के लोगों दोस्तों से होली मिलने आते जाते थे।होली के दिन बनी गुझिया “आठौ” तक चलती थी और जो होली मिलने आता था उसे खिलाया जाता था।होली के मौजमस्ती भरे त्यौहार के मौके पर कुछ लोग शराब पीकर होली के नाम पर हंगामा मारपीट रंग लगाने में जोर जबरदस्ती करके रंग में भंग डालकर खुशियों को मातम में बदल लेते हैं।होली का रंग जिन्हें नही भाता है उन्हें चाहिए कि वह बाहर न निकले और होली खेलने वालों को भी चाहिए कि वह किसी के घर में घुसकर रंग न लगाएँ।होली का रंग अधिकतम दोपहर बारह एक बजे तक ही चलता है और इसके बाद रंगबाजी करना उचित नहीं होता है क्योंकि एक बजे के बाद लोग होली मनाने अपने रिश्तेदारों के यहाँ निकल लेते हैं। कुछ असमाजिक तत्व और साम्प्रदायिक शक्तियां ऐसे अवसर पर त्यौहार की आड़ में रंग के बहाने सौहार्द को खराब करने का प्रयास करते हैं। हम फिर एक बार कहते हैं कि जो रंग नहीं लगवाना चाहता है तो उसे रंग लगाने की क्या जरुरत है ? यहाँ पर सवाल हिन्दू मुस्लिम से नही है बल्कि सवाल रंग न लगवाने से है।जब जोर जबरदस्ती होती है तभी असामाजिक तत्वों और साम्प्रदायिक शक्तियों को माहौल बिगाड़ने का अवसर मिलता है इसलिए जरूरी है कि उन्हें इसका मौका न दिया जाय।
भोलानाथ मिश्र वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
