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राजनीति में जातिवाद का दुष्प्रभाव

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भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। प्रजातंत्र का अभिप्राय है प्रजा का राज्य। लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा गया था कि ऐसा तंत्र जिसकी बागडोर प्रजा के हाथ में हो, ऐसा तंत्र जिसका नियामक देश का नागरिक हो। कहा गया था कि लोकतंत्र *प्रजा के द्वारा,प्रजा के लिए और प्रजा का होगा*
By the people, for the people and of the people.
आजादी के बाद यही नारा दिया गया था। यह नारा कितना साकार रूप ले रहा है इसका विश्लेषण आवश्यक है।
अंग्रेजों की नीति थी कि समाज को जाति और धर्म के आधार पर बांटो और राज्य करो – Divide and rule. काफी हद तक वे अपनी नीति में सफल रहे, यहां तक सफल रहे कि जाते जाते अखण्ड भारत को खण्डित कर गये। उस समय का हमारा शीर्ष नेतृत्व उनकी नीति को सही परिप्रेक्ष्य में समझ नहीं पाया जिसका दुष्परिणाम यह महान देश अभी भी झेल रहा है। सम्भवतः उस समय के राजनेताओं की महत्वाकांक्षा इसके लिए विशेष रूप से उत्तरदाई रही।
आजादी के बाद सत्ता परिवर्तन होता रहा। प्रारम्भ के अधिकतम समय में केन्द्र एवं राज्यों में कांग्रेस की सरकारें रहीं‌ जिसका प्रमुख कारण आजादी दिलाने में उनका योगदान रहा। सत्ता का सुख भोगने में तत्कालीन राजनेता इतने तल्लीन हो गये कि प्रजा गौंण हो गई। देश ने आपात काल देखा जो लोकतंत्र पर एक ऐसा काला धब्बा है जो कभी भी नहीं मिट सकता है। आपातकाल राजनीतिक महत्वाकांक्षा का चरम था।
बीच में मिली जुली सरकारें आईं लेकिन उनका कार्यकाल बहुत छोटा था। अटल जी का पहला कार्यकाल भी छोटा या लेकिन दूसरे कार्यकाल में वह विभिन्न विचारधाराओं वाले राजनेताओं को एकजुट करने में सफल रहे और अपना कार्यकाल पूर्ण किया। समय का चक्र घूमता रहा और जनसंघ का अभ्युदय हुआ। वही जनसंघ इस समय भारतीय जनता पार्टी के रूप में भारतीय राजनीति के क्षितिज पर छा गई है। इस समय भाजपा की स्थिति कमोबेश वैसी ही है जैसी आजादी के बाद कांग्रेस की थी।
भारत के लोकतंत्र का ढांचा स़घीय है – Federal Structure. संघीय ढांचे में केन्द्र सरकार के साथ साथ राज्य सरकारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। संविधान में कार्यों का विभाजन इस प्रकार किया गया कि केन्द्रीय सूची के साथ साथ राज्य की सूची में अनेक विषय रखे गए। केन्द्रीय सूची में रेलवे,सुरक्षा आदि बड़े देशव्यापी विषय रखे गए। राज्य सूची बनाते समय मुख्यतः दो बातों को ध्यान में रखा गया। प्रथम यह कि राज्य सरकारें स्वयं इतना संसाधन जुटा सकें जिससे उन्हें हर छोटे-बड़े कार्य के लिए केन्द्र सरकार पर आश्रित न होना पड़े। दूसरा यह कि राज्य सरकारें अपने संसाधनों से क्षेत्रीय आकांक्षाओं को पूर्ण कर सकें। राज्यों को कानून व्यवस्था का महत्वपूर्ण का कार्य सौंपा गया क्योंकि आर्थिक विकास तभी सम्भव है जब राज्य की कानून व्यवस्था दुरुस्त हो।
योजनाओं को बनाते समय इस बात पर बल दिया गया कि सामाजिक, आर्थिक एवं क्षेत्रीय विषमताओं को दूर किया जाय। इसमें काफी हद तक सफलता मिली लेकिन सामाजिक विषमता दूर करने के नाम पर जातिवाद का विकृत रूप सामने आ रहा है। राजनीतिक दल विकास एवं राष्ट्रहित की बातें न करके जाति के नाम पर वोट मांग रहे हैं। आरक्षण सबसे बड़ा मुद्दा हो गया है। आदर्श स्थिति यह होती कि जाति आधारित आरक्षण समाप्त कर आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाता। यह बात समझ से परे है कि आइ ए एस के लड़के को भी आरक्षण मिले।
शिक्षा एवं स्वास्थ्य ऐसे विषय हैं जिन्हें सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। शिक्षित एवं स्वस्थ युवा ही देश के विकास में योगदान कर सकता है।
सड़क और बिजली आदि अवस्थापना सुबिधाओं को इसलिए प्राथमिकता मिलनी चाहिए क्योंकि इनसे न केवल आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त होता है अपितु रोजगार भी सृजित होता है।
बेरोज़गारी दूर करना प्रत्येक सरकार की प्राथमिकता रही है लेकिन दुर्भाग्य यह है कि रोजगार को सरकारी नौकरी का पर्याय माना जाने लगा है। बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ बेरोजगारों की संख्या बढ़ना स्वाभाविक है। इसका सर्वोत्तम उपाय है, जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लगाया जाय और बेरोजगार नवयुवकों को प्रशिक्षित कर उन्हें स्व-रोजगार के लिए प्रेरित किया जाय। साथ ही साथ परम्परागत उद्योगों को बढ़ावा देना होगा ‌। यह सभी जानते हैं कि बेरोजगारी एवं गरीबी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हर हाथ को रोजगार मिले तो गरीबी स्वत: दूर हो जाएगी।
राष्ट्रीय सुरक्षा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि असुरक्षित राष्ट्र कभी भी प्रगति नहीं कर सकता है। विशेषकर केन्द्र में ऐसी सरकार होनी चाहिए जो राष्ट्र की सुरक्षा की गारंटी दे।
इस समय लोकसभा के चुनाव हो रहे हैं। प्रत्येक मतदाता का कर्तव्य है कि वह अपने मताधिकार का उपयोग करते समय बिना किसी प्रलोभन या दबाव के अधिक से अधिक संख्या में वोट दे।
( गिरजा शंकर तिवारी )

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