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ऐ जिन्दगी मेरे सामने अदब से पेश आया कर – डा. सरिता चंद्रा

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ऐ जिन्दगी मेरे सामने अदब से पेश आया कर

तेरी नादानी और मनमानी से मन भर गया

तू मेरी मजबूरियों का न मज़ाक उड़ाया कर

मैंने तुझसे सारे रिश्ते तोड़ दिए हैं इसलिए

ऐ जिन्दगी मेरे सामने अदब से पेश आया कर

तेरी उलझनों में उलझा, मैं तेरा गुलाम न रहा

जो परेशानियों से डरे, अब मैं वो इंसान न रहा

अब तू मुझे अपनी मुश्किलों से न डराया कर

ऐ जिन्दगी मेरे सामने अदब से पेश आया कर

जिन्हें कदर नहीं रिश्तों की, उनसे न मिलाया कर

जो छुट गया उनकी याद में, आंसू न बहाया कर

डरती नहीं मै तुझसे, तू मुझे आँख न दिखाया कर

ऐ जिन्दगी मेरे सामने अदब से पेश आया कर

तेरी गुस्ताखियों से अब मैं अनजान न रहा

तेरी उलझी राहों का भटका हुआ इंसान न रहा

तू अपने फरेबी तेवर मुझको न बताया कर

ऐ ज़िन्दगी मेरे सामने अदब से पेश आया कर

बहुत कुछ गलत किया है, तूने मुझे उलझा कर

सीख लिया है, मैंने अपनी उलझनों को सुलझाना

सही-गलत की परिभाषा, अब तू न समझाया कर

ऐ जिन्दगी मेरे सामने अदब से पेश आया कर

लेखिका – डॉ सरिता चंद्रा

बालको नगर कोरबा (छ.ग.)

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